(1)
गिरगिट पोषित होते, वायु, उजाला, पीकर,
प्यार और यश ही होता है, कवि का भोजन!
काश! कहीं चिंता से पूरित विस्तृत जग पर,
कर पाते उपलब्ध सहज ही इसको कविगण!
हाँ, यदि वे भी अपने को गिरगिट सा करते,
तो पा सकते थे इसको कर कम से कम श्रम!
पाते बदल रंग कवि भी जो गिरगिट के सम!
जिसको वे अनुरूप हर किरन के हैं धरते,
बीस बार दिन में रंग निज काया में भरते?
(2)
कवि भी ऐसे ही इस शीतल जगतीतल पर,
यों, वे गिरगिट के होते समान जग भर में,
अनजाने प्रारंभिक जन्म काल से लेकर,
सागर के नीचे वे दूर किसी गह्वर में,
जहाँ उजेला हैं गिरगिट होते परिवर्तित।
जहाँ न मिलता प्यार, वहाँ कवि बदला करते!
यश भी तो है छद्म प्यार; यदि कुछ पा जाते—
कोई सा, तो कभी न होना इस पर विस्मित,
कवि (हम दोनों छोर बीच) होते परिवर्तित!
(3)
तो भी करो न दुस्साहस लेकर धन या बल,
कवि के मुक्त दिव्य-मानस को करने कलुषित!
खाएँ अन्य खाद्य यदि यह उज्ज्वल-गिरगिट-दल,
छोड़ वायु और धूप, शीघ्र ही होंगे विकसित,
ऐसे ही, जैसे हैं और भूमि पर जीवित!
अन्य भ्रातृजन, छिपकलियों के ही समान हो!
तुम हो फिर, नक्षत्र शुभ्रतर की संतानो!
तुम अवनीश परे की हो, आत्माएँ उज्जवल!
लौटा दो यह दान इसी पल!
- पुस्तक : शेली (पृष्ठ 37)
- संपादक : यतेन्द्र कुमार
- रचनाकार : पर्सी बिश शेली
- प्रकाशन : भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़
- संस्करण : 2006
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