Font by Mehr Nastaliq Web

अक्कड़-बक्कड़

akkaD bakkaD

विभूति तिवारी

विभूति तिवारी

अक्कड़-बक्कड़

विभूति तिवारी

और अधिकविभूति तिवारी

    भाई के साथ खेलते हुए  

    हमको कहाँ पता था 

    मैं लड़की

    वह लड़का है 

    हमको तो खेल पता था 

    पता था भूख लगे पर खाना 

    बस्ता उठाकर 

    भागते हुए स्कूल जाना 

    ख़ुराफ़ातियाँ कर खिलखिलाना 

    ऊपर से इतराना 

    पोशाकें भी तब कहाँ 

    अलग-अलग होती थीं 

    चड्डी पहनकर आँगन में 

    खिल सकता था कोई भी फूल

    जो खेल भाई को रुचता था 

    उसी में मेरा भी मन लगता था 

    अक्कड़-बक्कड़ बंबे बोल 

    अस्सी नब्बे पूरे सौ का 

    मचाते हुए शोर 

    घर-आँगन-बाड़ी के 

    लगाए इतने चक्कर 

    कि गणपति की बुद्धि भी 

    खा गई घनचक्कर

    अक्कड़-बक्कड़ दही चटक्कड़ 

    बोल-बोलकर दूध-दही-मक्खन के 

    बेहिसाब कटोरे किए चट 

    तो ढीले किए 

    कितने ही बंधनों के नट 

    कई बार मुझे लगता है 

    पानी को जैसे पानी की तरह  

    रोशनी को जैसे रोशनी की तरह 

    पहचाना जाता है 

    उसी तरह पहचाना जाता 

    मनुष्य को यदि मनुष्य की तरह 

    तो कितनी ख़ूबसूरत होती यह दुनिया 

    सुनो हम भले ही बना नहीं पाए हों 

    वैसी ख़ूबसूरत दुनिया 

    लेकिन अपने भीतर बसा रखी है 

    हमने बचपन की वह दुनिया 

    जो हमें स्त्री या पुरुष होने के पहले 

    बनाए रखती है मनुष्य।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विभूति तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY