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अब ख़याल

ab khayal

वियोगिनी ठाकुर

अन्य

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और अधिकवियोगिनी ठाकुर

    अब उसे आत्महत्या के ख़याल नहीं आते

    यह किसी गुज़रे ज़माने की बात रही होगी

    ठीक वैसे ही

    जैसे ज़िंदगी के एक दौर में

    ख़्वाब नहीं आते

    नींद नहीं आती

    मुस्कान भी नहीं…

    वह एक ज़िंदगी से भरपूर लड़की थी

    वह हो जाती थी छोटी-छोटी बातों में ख़ुश

    वे कहते रहे—

    वह किसी दिन भाग जाएगी घर से

    वे कभी जान ही नहीं पाए

    कि उसे सिर्फ़ भागना ही नहीं आया

    वह सिर्फ़ इतनी ख़ुशक़िस्मत रही

    कि प्रेम में रही

    लेकिन इतनी भी नहीं

    कि कोई कसकर किसी दिन

    उसका हाथ थाम लेता

    और कहता—

    मैं हूँ हमेशा साथ तुम्हारे

    वे कहते हैं :

    उसके हाथों हत्याएँ होंगी

    वे कभी जान ही नहीं पाए

    कि जो लड़की आँगन बुहारते वक़्त

    चींटियों के बनाए घर तक

    वैसे ही छोड़ दिया करती

    वह कैसे किसी की हत्या कर सकती है!

    क्या उसके माथे यह अपराध धर देना

    उसकी ही हत्या कर देना नहीं था।

    स्रोत :
    • रचनाकार : वियोगिनी ठाकुर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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