वसंत वर्णन

स्वयंभू

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    पंकय वयणउ कुवलय-णयणउ केयइ-केसर-सिर-सेहरु।

    पल्लव करयलु कुसुम-णहुजल्लु पइसरइ वसंत-णरेसरु॥

    डोला-तोरण-वारें पईहरें। पइठु वसंतु वसंत-सिरी हरें॥

    सररुह-वासहरेंहिं रव-णेउरु। आवासिउ महुअरि-अंतेउरु॥

    कोइल-कामिणीउ उज्जाणेहिं। सुय-सामंत लयाहर-थाणैंहिं॥

    पंकय-छत्त-दंड सर णियरेंहिं। सिहि-साहुलउ महीहर-सिहरेंहिं॥

    कुसुमा-मब्जरि-धय साहारेंहिं। दवणा-गंठिवाल केयारिंहिं॥

    वाणर-मालिय साहा-वंदेंहिँ। महुअर मत्तवाल (?) मयरंदेंहिँ॥

    मब्जु-ताल कल्लोलावासेंहिं। भुज्जा अहिणव-फल-महणासेंहिं॥

    एम पइट्ठु विरहि विद्धंतउ। गयवइ-वम्मेंहिं अंदोलंतउ॥

    धीरे-धीरे अब वसंत राजा का प्रवेश हुआ। कमल उसका मुख था, कुमुद नेत्र, केतकी, पराग, सिर शेखर-सिरमुकुट, पल्लव करतल और फूल उसके और उज्ज्वल नख थे।

    राजा वसंत ने डोला और तोरणों से सजे द्वार वाले वसंत श्री के घर में प्रवेश किया। कमलों के वासगृहों में शब्दरूपी नूपुर था। मधुरकारियों का अंतःपुर उसमें बसा हुआ था। उद्यानो में कोयलरूपी कामिनी थी। लता गृह के स्थानों में शुकरूपी सामंत थे। सरोवरों में कमलों के छत्र-दंड थे। पहाड़ों के शिखरों पर मयूर का नृत्य था। आम्रवृक्षों में कुसुम और मंजरी की पताकाएँ थीं। केदार-वृक्षों में दवना-लतारूपी भांडार-रक्षक थे। शाखाओं में बंदररूपी माली थे। मकरंद में मधुकरूपी मत्त बाल थे। लहरों के आवास में सुंदर ताल था। अभिनय फलों के भोजन-गृहों में अग्रभोजक थे। इस तरह गजराज कामदेव से आंदोलित विरही को जलाता हुआ वसंत पहुँचा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पउम चरिउ (पृष्ठ 214)
    • संपादक : हंसराज बच्छराज नाहटा
    • रचनाकार : स्वयंभू
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ, काशी
    • संस्करण : 1944

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