दूसरइ कडवइ गणपति गाइ

नरपति नाल्ह

दूसरइ कडवइ गणपति गाइ

नरपति नाल्ह

और अधिकनरपति नाल्ह

    दूसरइ कडवइ गणपति गाइ।

    नवण करी नइ लागु जी पाइ॥

    तोहि लंबोदर वीनवउं।

    सिद्धि नइ बुद्धि तणउ रे भंडार।

    चउथि करऊं तुझ पारणउ।

    भूलउ जी अक्षर आणिज्यो ठांइ॥

    दूसरे कडवक में हे गणपति! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ और तुम्हारे पैरों लगता हूँ। तुम से हे लंबोदर! मैं विनय करता हूँ। सिद्धि और बुद्धि के तुम भंडार हो। गणेश-चतुर्थी को मैं तुम्हारा पारण करता हूँ। तुम मेरा भूला हुआ अक्षर ला देना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीसलदेव रास (पृष्ठ 86)
    • संपादक : अगरचंद नाहटा
    • रचनाकार : नरपति नाल्ह
    • प्रकाशन : हिंदी परिषद् प्रकाशक, प्रयाग
    • संस्करण : 1959

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