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ये जो मिट्टी की महक है

ye jo mitti ki mahak hai

सुनील मिश्र

सुनील मिश्र

ये जो मिट्टी की महक है

सुनील मिश्र

और अधिकसुनील मिश्र

    ये जो मिट्टी की महक है, गेहूँ में क़तई दरकार नहीं

    यही बाज़ार का कानून है मेरा जाती इसरार नहीं

    ये ज़मीं जो है, जंगल जो है पानी जो है बेचते नहीं

    हम क़ुदरत की हर शै के परिस्तार हैं, ख़रीदार नहीं

    ये एक दर्द का रिश्ता है वो क्या समझेगा जिसके

    सीने में मोहब्बत नहीं, जीने में कोई प्यार नहीं

    ये क्या कानून है, हमको कोई समझा दे

    उनके भी सूद चुकाएँ जिनके क़र्ज़दार नहीं

    बहुत मुमकिन है कि शहरों में हम मुज़रिम ठहरें

    हम तो शहरी नहीं, इंसाफ़ के ह्क़दार नहीं?

    पहले सुनते थे हमीं इस मुल्क़ के मालिक होंगे

    अब ये सुनते हैं कि हम घर के मी मुख़्तार नहीं

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुनील मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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