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सगरो मचल बवाल

sagro machal baval

मिथिलेश ‘गहमरी’

मिथिलेश ‘गहमरी’

सगरो मचल बवाल

मिथिलेश ‘गहमरी’

और अधिकमिथिलेश ‘गहमरी’

    सगरो मचल बवाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    मधुबन भइल बेहाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    जहवाँ सेवार बा, उहाँ मछरी के नाम पर

    रोजे डलात जाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    इस्कूल, अस्पताल, अदालत, तिरिथ-बरत

    सबका सिरे दलाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    अबले त' रोटिये प' सिरिफ जुल्म सब रहे

    इज्जत के अब सवाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    ऊपर से लागे आदमी गंगा के घाट-अस

    भीतर से मरले पाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    जुगनू के रोशनी मिले, गरहन सुरूज बदे

    एहिजा, इहे त' हाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    गाँव, समाज, मिसरी घुलल जुबान

    अबले पड़त खियाल बा, हम कइसे चुप रहीं

    स्रोत :
    • पुस्तक : केकरा से माँगीं अँजोर (पृष्ठ 52)
    • रचनाकार : मिथिलेश ‘गहमरी’
    • प्रकाशन : सत्यांश उपक्रम (प्रा.) लिमिटेड, बलिया
    • संस्करण : 2019

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