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रोज़ बढ़ जाती हैं

roz baDh jati hain

सुनील मिश्र

सुनील मिश्र

रोज़ बढ़ जाती हैं

सुनील मिश्र

और अधिकसुनील मिश्र

    रोज़ बढ़ जाती हैं क़ीमतें थोड़ी, रोज़ बढ़ जाती है लाचारी

    रोज़ निकल आतीं हैं ज़रूरतें नई संग लिए नई मारामारी

    जाने अब कौन-सी दुनिया में कर बस गए हैं हम लोग

    दिन उजाला लिए आता है रात लगती है उतनी अंधियारी

    हरेक गली यहाँ की फ़रेब* रचती निकल जाती है दूर कहीं

    हर रास्ते पर चल रही है किसी ख़ौफ़नाक जंग की तैयारी

    सब अमन-चैन-ओ-सुकून से हैं अब लहू नहीं बहता कहीं

    बस नज़रें जरायमपेशा* हो गईं हैं आवाज़ें लगती हैं हत्यारी

    *फ़रेब=धोखा

    *जरायमपेशा=ज़ुर्म जिनका पेशा हो

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुनील मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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