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नाक हुवै ऊँची

naak huvai uunchi

अशोक अज्ञानी

अशोक अज्ञानी

नाक हुवै ऊँची

अशोक अज्ञानी

और अधिकअशोक अज्ञानी

    नाक हुवै ऊँची यहिते अस धाक जमावत हैं।

    फोटू छपवावै की खातिर पेड़ लगावत हैं॥

    बात चलत है जब कुल कै तो बहुत कुलीन बनैं

    वाटन के बदि नीचे के घर खाना खावत हैं॥

    सत्ता के सुखु का चस्का जल्दी ते ना छूटै

    यहि दल ते वहि दल मा अक्सर जावत हैं॥

    पहिले चना चबा चबाय कै काटत रहैं दिना

    अब जनता का लोहे केरि चना चबवावत हैं॥

    आवेदन तौ रोजु सैकरन आवत दफतर मा

    जेहिका चाहत हैं बस वहि पर मोहर धरावत हैं॥

    आपन दाँव चलावै मा हुइगे सातिर यतना

    आगि लगावत पहिले बादिम जाय बुझावत हैं॥

    ऊपर ते पयिसा जब आवै अइसा काम करैं

    आँखिन के आगे पानी मा दूध मिलावत हैं॥

    तुमहिन स्वाचो समझो को आहीं रे भइया

    हम तो हँसै हँसावै का यह गजल बनावत हैं॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक अज्ञानी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित।

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