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छुट्टा हरहा खेतु

chhutta harha khetu

अशोक अज्ञानी

अशोक अज्ञानी

छुट्टा हरहा खेतु

अशोक अज्ञानी

और अधिकअशोक अज्ञानी

    छुट्टा हरहा खेतु चरत हैं, राम कसम।

    जिन्दा रोजु किसान मरत हैं, राम कसम॥

    पिसत जात हैं गेहूँ के संग घुन भइया

    पीसन वाले मजा करत हैं, राम कसम॥

    खायँ बिलारी बाँधे जात हवैं कूकुर

    छाती ऊपर मूँग दरत हैं राम कसम॥

    परमारथ कै बातै खाली बातै हैं

    होम करै मा हाथ जरत हैं, राम कसम।

    भीतर भीतर झउवन काँटा भरे हवैं

    बातन बातन फूल झरत हैं, राम कसम॥

    फीकी फीकी चीजें मालिक बाँटत हैं

    नीकी नीकी खुदै धरत हैं , राम कसम॥

    कबहूँ कबहूँ जनता कै किस्मति जागै

    नेता बारौ मास फरत हैं , राम कसम॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक अज्ञानी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित।

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