भेल ई की, कहाँ सँ लहरि गेल अछि
bhel ii ki, kahan san lahari gel achhi
भेल ई की, कहाँ सँ लहरि गेल अछि
प्रश्नवाचक धरापर पसरि गेल अछि।
आदमी आदमी केर बैरी बनल
कोन नभसँ घृणा ई उतरि गेल अछि।
अछि बटोही सशंकित बनल बाटपर
दिनमे आभास रातुक अभरि गेल अछि।
गंध टटका पवनमे भरल शोणितक
प्रीत पाहन बनल आस सरि गेल अछि।
उर काँपैछ धरतीक भालरि जकाँ
युग आदम कोना फेर पलटि गेल अछि।
- पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 14)
- रचनाकार : कलानन्द भट्ट
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1983
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