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ये दिन कनाट प्‍लेस के

ye din kanat a‍les ke

ओम निश्चल

ओम निश्चल

ये दिन कनाट प्‍लेस के

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    सुबह की चम्‍पई किरन

    धुली-धुली सी हर नज़र

    यहाँ-वहाँ जहाँ-तहाँ

    दमक रहे शजर-शजर

    हैं ख़ामुशी भरे ये पल सुबह के श्रीगणेश के।

    ये दिन कनाट प्‍लेस के।

    यहाँ की धड़कनों से

    जागती हैं धड़कनें कई

    यहाँ के स्‍निग्‍ध लॉन पर

    मिलेगी ज़िंदगी नई

    यहाँ इमारतों का व्‍याकरण ही

    कुछ अलग-सा है

    अलग-सी धुन, अलग मिज़ाज

    सब अलग-थलग-सा है

    यहाँ बसे हैं आके लोग-बाग देस-देस के।

    ये दिन कनाट प्‍लेस के।

    यहाँ की सुरमई-सी सांझ

    में अमन का राग है

    यहाँ के छवि-वलय में

    एक दिव्‍य-सा पराग है

    सुबह से शाम तक

    यहाँ विराजती चहल-पहल

    रचे यहीं हों ज्‍यों किसी ने

    स्‍वप्‍न के हवा महल

    विराजते यहाँ हैं देवता मनुज के देश के।

    ये दिन कनाट प्‍लेस के।

    ये दिल है देश का

    कि देश की है सल्‍तनत यहीं

    सियासतों का गढ़ यही

    कलाविदों के घर यहीं

    भले बिछी हों राह में

    यहाँ चुनौतियाँ कईओ

    परों को चूमती हैं आके

    कामयाबियाँ यहीं

    छिड़क गया है सुर कोई यहाँ पे राग-देस के।

    ये दिन कनाट प्‍लेस के।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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