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विद्यापतिक नोर

vidyaptik nor

गंगेश गुंजन

गंगेश गुंजन

विद्यापतिक नोर

गंगेश गुंजन

और अधिकगंगेश गुंजन

    देसिल बयना सबजन मिट्टा

    बेश बनि गेलय हँसी ठट्ठा

    भाषा आर मैथिल जनता केर

    पड़ल भरना कठ्ठा-कठ्ठा।

    नेता एखनहुँ मंचक धरनि

    हुनका नहि किछु करय पड़नि

    खाली पुजबधि पैर लोकसँ

    मोटगर फूलक माला गर्दनि।

    भाषण-भूषण वेश उच्च स्वर

    दऽ सकैत छथि पहर दूर पहर।

    मुदा चिन्ता असली बातक

    सैकड़े सत्तरि एखनहुँ नहि घर

    शिक्षा, भोजन-वस्त्रक बात

    जन-जन केर एहि कष्टसँ कात

    अपने जीवथि रहथि सुभ्यस्थ

    कियेक सहथि क्लेशक अवघात?

    तैयो बजैत नोराइन आँखि

    बजिते बजैत गऽर भरि जाइनि

    लोकक दुःख कहिते-कहिते

    सपरिवार सुखमे रहिते।

    लोक-प्रेम कयलनि सुड्डाह

    अपन स्वार्थ जनता केर प्राण

    कउखन भाषा कौखन धर्म

    लड़ा-भिड़ा जीयबे छनि कर्म

    फूसिक भेदक ऊँच देवाल

    ठाढ़ करधि फोड़थि दस लोक

    शुद्ध हृदय जनता बौआय

    भैयारी बीच माथ फोड़ाय

    सभ समस्या ठामक ठाम

    पढ़ल बेरोजगार अथाह

    भेल अछि मिथिला गामक गान

    डिग्री चिचिआइत अछि काम

    बोझ लगैत प्रतिभाक विलाप

    क्यो ने सुनय दिअय नहि कान

    पैंतीस छत्तीस बर्खक होइत

    लोक ने तखनहुँ भेल जुआन

    हाहाकारक परिवेश

    जरैत जाहिमे सौंसे देश।

    तै मे लेसि विभेदक आसि

    लड़ितहि रहब रहत की शेष?

    के अनकर अछि के अप्पन

    समाज केहन अवदान

    अछि ने सुरक्षित भोजन-वस्त्र

    ने निरापद लोकक प्राण।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दुःखक दुपहरिया (पृष्ठ 30)
    • रचनाकार : गंगेश गुंजन
    • प्रकाशन : क्रान्तिपीठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1999

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