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विधाता, दुखवा ना कहले कहाता

vidhata, dukhva na kahle kahata

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

विधाता, दुखवा ना कहले कहाता

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    विधाता, दुखवा ना कहले कहाता।

    सन् सैंतालिस में मिलल अजदिया,

    अतने तरक्की कि बढ़ल अबदिया,

    सगरे अन्हरिया के चद्दर तनाता।

    साहेब बदल गइलें, कुर्सी ना बदलल,

    संसद में अबो बिछावल बा मखमल,

    हाकिम के कुकुरो के रोब बढ़ल जाता।

    नेता जी खादी के कुरुता सिआवसु

    रात में शराब अउर मुरुगा उड़ावसु

    दुअरा प’ कुकुरा बेलायती बन्हाता।

    रोज-रोज ओट होखे, रोज-रोज भासन,

    लूट-मार बढ़ल जाता, कइसन शासन,

    रेडियो गितिया विकास के गवाता।

    बुँटवा-गहुँमवा से महंगा खेसारी

    सरिसो के तेलवा के भइल महामारी

    पाँच रुपये बोतल किरासन बिकाता।

    रोज-रोज बढ़ल जाता टैक्स लगनवा

    भइलें बेहाल मजदूर किसनवा

    सेठजी के छंवड़ा के मोटर किनाता।

    रूस अमेरिका से दोस्ती गंठाइल,

    दूनो के पेटा में देसवा जंताइल

    काम होता कम, बहुत पोस्टर टंगाता।

    रोज-रोज गाड़ी लड़े, गिरे जहजिया

    मंत्री जी करेलन, तबो चुहुलबजिया

    मुअला लोगन के रूपया दिआता।

    'कांग्रेस' 'जनता' के दंवरी नधाइल,

    तबो चैन मिलल, लोग भकुआइल,

    नया-नया रोजे विधान बनत जाता।

    गांवा-गाई रोड बने, दउरेला थनवां

    सहता हो गइल गरीबवन के जनवां

    हक़ आपन मँगला प' लोग खिसिआता।

    विधाता, दुखवा ना कहले कहाता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 10)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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