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कहीं जीत कहीं हार

kahin jeet kahin haar

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

कहीं जीत कहीं हार

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    गीत जिनिगी के छन-छन, निहार लिखली,

    जवन पवलीं अँजोर या, अन्हार लिखलीं।

    केतने गुजरल ना जाने तपन जेठ के,

    केतने सावन के रिम-झिम फुहार लिखलीं।

    जवन पवलीं…

    कहीं डगमगाति नाव के किनारा मिलल,

    कहीं डूबत भँवर, मजधार लिखलीं।

    जवन पवलीं…

    पार केतने भइल ऊँच-खाल रहिया,

    एक बहुते चढ़ाव, एक उतार लिखलीं।

    जवन पवलीं…

    बाते-बाते खनक जो गइल हाथ के,

    कतहीं कँगना कतहीं, कटार लिखलीं।

    जवन पवलीं…

    रंग बदलल जो मौसम कइक रूप में,

    कबहूँ पतझर कबहूँ, बहार लिखलीं।

    जवन पवलीं…

    फैसला हो सकल ना जमाना से,

    हर कदम कहीं जीत, कहीं हार लिखलीं।

    जवन पवलीं…

    स्रोत :
    • पुस्तक : लोक रागिनी (पृष्ठ 223)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : रागिनी प्रकाशन, गाजीपुर
    • संस्करण : 1995

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