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वौराई-सी

vaurai si

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    वौराई-सी

    अकुलाई-सी

    वक्ष लिपट कर रोई राधा

    फूट-फूटकर

    बिलख-विलखकर

    काँधे सिर धर रोई राधा

    आकर लौट

    जाएँ प्रियतम

    साँकल नहीं लगाई मैंने

    दीपक जलता

    रहा रात भर

    बाती नहीं बुझाई मैंने

    पत्तों की भी

    आहट सुनकर

    कितनी वार हुई आशांवित

    दृग में रहकर

    भी पसीजे

    अब दो उत्तर रोई राधा

    आँज गए दृग

    सावन भादों

    काजल आँखों में टिका फिर

    दर्पण-दर्पण धूल

    ज़मी है

    गलियों में गजरा बिका फिर

    हरसिंगार

    झरा या सूखा

    इसकी चिंता किसको होती

    द्वार टिकी

    दृग बिछे पंथ पर

    हिचकी भर-भर रोई राधा

    हंसा ज्ञात नहीं

    कब लौटे

    देख रही थी दूर हंसनी

    मान सरोवर

    तीर अकेली

    थी उदास मजबूर हंसनी

    आख़िर किन

    जन्मों का बदला

    लेते रहे अरे निर्माही

    सूजी-सूजी

    सी पलकों से

    फूटा निर्झर रोई राधा

    बिन माझी

    पतवार, अकेली

    तैरी हूँ सुधियों का सागर

    शीर्षक लिखकर

    छोड़ गए तुम

    जीवन की कोरी पुस्तक पर

    यौवन जटिल

    ग्रंथ था संमुख

    कैसे पढ़ती कौन पढ़ाता

    ढाई अक्षर पढ़कर

    आगे

    अक्षर-अक्षर रोई राधा

    बौराई-सी

    अकुलाई-सी

    वक्ष लिपट कर रोई राधा

    फूट-फूट कर

    बिलख-बिलखकर

    काँधे सिर धर रोई राधा

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 23)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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