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अझुराइल रहब कब ले लोटा-थरिये में

ajhurail rahab kab le lota thariye mein

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

अझुराइल रहब कब ले लोटा-थरिये में

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    अझुराइल रहब कब ले लोटा-थरिये में,

    पिया, चलऽ अब रहीं जा सहरिये में।

    करत-करत घर के काम, जरल देहिया के चाम,

    रोज जागे के परेला भिनुसरिये में।

    घर में नइखे अनाज, तबो भरे के बा ब्याज,

    लूट मचल बाटे, दिने-दुपहरिये में।

    जे चलावे लाठी भाला, उहे बड़का गिनाला,

    जुलुम होता इहाँ, देखऽ कचहरिये में।

    मिले पूरा ना मजूरी, करऽ तबो जी-हजूरी,

    जिनिगी बीति जाई इहाँ गोड़धरिये में।

    भसल बरखा में घर, लागे चोरवन से डर

    टाँगा लागि गइल, हमनी के जरिये में।

    परीं कबो जे बेमार, नइखे केहू देखनिहार

    लपटाइल बड़ुए साँपवा लउरिये में।

    नइखे बिजुली के पोल, दिया-बाती भइल गोल

    रोटी सेंके के बा इहाँ अब भउरिये में।

    परे हरदम अकाल, धँसि गइल दुनो गाल

    गइल चढ़ल जवानी नकदरिये में,

    छंवड़ा पढ़हूँ ना जाला, उहो बड़हन रिजाला,

    रोज बकरी चरावेलाऽ रहरिये में।

    नेता गइलन रजधानी, काटसु बइठल चानी।

    सुखवा बाटे नेतागीरी के नोकरिये में।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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