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स्वयं को होम कर हमने

svayan ko hom kar hamne

मनोज जैन

मनोज जैन

स्वयं को होम कर हमने

मनोज जैन

और अधिकमनोज जैन

    उछलकर बल्लियों,

    दिल ने,

    मधुर स्नेह बरसाया।

    निगाहों से निगाहों ने,

    दिलों के राज खोले थे।

    अधर चुप थे मगर दिल के,

    बहुत जज़्बात बोले थे।

    मधुर-रस प्रेम का,

    पीकर,

    ह्रदय का भृंग गुंजाया।

    परस्पर प्रेम में पड़ दिल,

    समय की डाल पर झूले।

    अधर का रस छुअन चुंबन,

    तुम भूले हम भूले।

    समय को जी लिया हमनें,

    मिलन का,

    क्षण हमें भाया।

    मिलन का क्षण बड़ा पावन,

    नई सौगात लाया था।

    बिना मौसम दिलों ने जब,

    मदन उत्सव मनाया था।

    यमन के राग पर हमने,

    प्रणय का,

    गीत था गाया।

    कलश रस प्रेम का आगे,

    कभी बरसे नहीं बरसे।

    मिलन के क्षण धरोहर हैं,

    मदन मन याद कर हरसे।

    स्वयं को होम कर हमने,

    नया वरदान,

    फिर पाया।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मनोज जैन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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