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सुनऽ हो मजूर, सुनऽ हो किसान

sunऽ ho majur, sunऽ ho kisan

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

सुनऽ हो मजूर, सुनऽ हो किसान

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    सुनऽ हो मजूर, सुनऽ हो किसान

    सुनऽ मजलूम, सुनऽ नौजवान

    मोरचा बनाव बरियार कि सुरु भइल लमहर लड़इया हो

    एक ओर राजा-रानी, सेठ साहूकरवा

    पुलिस-मलेटरी अउर जमींदरवा

    दोसरा तरफ भूमिहीन बनिहरवा

    खेतवा-खदनवां के करे जे सिंगरवा

    हो जा भइया तूहूँ, अब तैयार कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

    खेतवा में खटलऽ, बघरिया अगोरलऽ

    जिनिगी में मालिके के घरवा संगोरलऽ

    टभकत घउआ के कबहूं फोरलऽ

    बोरसी के अगिया के अबले ना खोरलऽ

    उठऽ बहल पुरवा बेआर कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

    तोहरे लइकवा बनावेला बनूकवा

    तोहरे कमइया से भरेला सनूकवा

    ढरकल रतिया, उगल देखऽ सूकवा

    जरि जइहें जुलुमी, तू मारऽ तनी फूँकवा

    उमड़ल जनता के धारऽ... कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

    रनिया करेले रजधनिया में खेलवा

    समराजवदिअन से कइलसि मेलवा

    जनता के पेरिके निकाले रोज तेलवा

    मुँह खोलि दिहला मिलत बा जेलवा

    निकसल ललका गोहारऽ... कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

    मोरचा बनाव बरियारऽ... कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

    सुनऽ हो मजूर सुनऽ हो किसान

    सुनऽ मजलूम, सुनऽ नौजवान

    मोरचा बनाव बरियार... कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम कबीर के बानी (चयन : अरविन्द कुमार) (पृष्ठ 52)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 2009

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