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बिन कहल गीत अमूर्त्त

bin kahl geet amurtt

गंगेश गुंजन

गंगेश गुंजन

बिन कहल गीत अमूर्त्त

गंगेश गुंजन

और अधिकगंगेश गुंजन

    नहि बूझल भेल

    देह, श्वांस प्रान

    सभ तेँ छल अपनहि लोक अपन-आन।

    बैसल-बैसल बाट देखैत बुंदपात

    भीजल मन सतत,

    भरल साँझ प्रात

    खसल कौखन चिड़ै जकाँ

    भेल झूर अमान

    नहि छल अप्पन तखन ने कतहु कोनो आन।

    सभ यात्रा कयलक काते कात

    हमरा काँट-कटैया बनि कऽ

    घेरने रहल किछु बात

    बंद रहल हमरा लेखेँ

    दरबज्जा दलान

    अपने तेँ मृतप्राय देलक ने हुलकी क्यो आन।

    पिहकारी अट्टहास

    घूमल सब गामे गाम

    जड़ता बटवृक्ष महा ठाढ़ ठाम-ठाम

    निभरोस आँखिमे धधकल

    दुनिया जहान

    दुःखेँ कोइली टूटल भरलक एक तान

    कातमे करौट लैत रहल अनचिन्हार अप्पन आन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दुःखक दुपहरिया (पृष्ठ 2)
    • रचनाकार : गंगेश गुंजन
    • प्रकाशन : क्रान्तिपीठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1999

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