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सोन दाइ

son dai

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    रहतौ ने हास, बहि जेतौ विलास गय,

    दुइ दिवसक जिनगी सँ हेवेँ निराश गय।

    भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ,

    मोहक उमंग बीच, प्राण किएक पागल छौ,

    चलि जेतौ सुनेँ कंठ लागल पियास गय।

    दुइ...

    बाल वृन्द जा रहला, नव-नव युवको चलला,

    बूढ़-सूढ़ जरि-मरि कऽ माटि तऽर परि गलला,

    तैयो छौ अपना पर व्यर्थ विश्वास गय।

    दुइ...

    अपना केँ चीन्हे तोँ नाम तोहर सोन दाइ”

    टलहा सँ मेझर भऽ मूँह छौ मलीन आइ

    देश कोश विसरि-काटि रहलेँ प्रवास गय।

    दुइ...

    नेनपन चलि भागलि आब इतिवस्था एतौ,

    कहेँ कनेक गुनि धुनि कऽ तकर बाद की हेतौ,

    कहिया धरि कऽ सकबेँ पर घर मे वास गय।

    दुइ...

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 32)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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