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श्री राम केवट संवाद

shri raam kevat sanvad

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

श्री राम केवट संवाद

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    हम सभ कते काल सँ नदी कात छी ठाढ़ औ,

    पहुँचाबू ओहि पर ना।

    संगमे नव-नौतून परिवार,

    कलकल गंगा जीक धार,

    केवट पकड़ू-पकडू अपने सँ पतवार औ,

    पहुँचाबू…

    चिन्हलहुँ-चिन्हलहुँ सरकार,

    थिकियै अवधक राजकुमार,

    सुन्हलहुँ चरण कमल मकरंदक चमत्कार औ,

    नहिं पहुँचायब पार ना।

    लागल फेर चरण मे धूरि,

    छुविते नैयो जेतै ऊड़ि

    पोसब कहू कोन कोन तखन अपन परिवार औ,

    नहिं पहुँचायब पार ना।

    पहिने तरबा अपन धोआऊ,

    तकरा बाद नाव पर जाऊ,

    अपने जोँ चाहै छी उतरऽ दिन-देखार

    पहुँचाबू ओहि पर ना।

    सुनिते प्रेमक अटपट बात,

    प्रभुकेर सिहरऽ लागल गात,

    पसरल मुँह पर मुस्की मन मे भरल दुलार औ,

    पहुँचाबू ओहि पर ना।

    हुलसल मन उमड़ल आनंद,

    धोलक पद कमलक मकरंद

    अमृत-ओदक पिविते भेल सकुल उद्धर औ,

    रघुवर भेलेनि पार ना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 86)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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