Font by Mehr Nastaliq Web

साँसत में जान

sansat mein jaan

ब्रजभूषण मिश्र

ब्रजभूषण मिश्र

साँसत में जान

ब्रजभूषण मिश्र

और अधिकब्रजभूषण मिश्र

    रोज-रोज अंधड़ बा

    रोजे तूफान,

    एकरा से लड़त-भिड़त

    जिनगी हलकान।

    व्यस्त बाटे राजपथ

    खुरपेरिया निर्जन,

    कंक्रीट जंगल में

    आकुल बा तन-मन;

    रेत भरल सागर बा,

    साँसत में जान।

    हर केहू महाबली

    केहू ना कम,

    लागे उजाड़ दिही

    ठोकत बा खम;

    आपन पड़ोसी से

    नइखे पहिचान।

    आपन घेरवना

    जीवन के जंजाल,

    जिनगी जोगावे में

    भइलीं पैमाल;

    खरकत जमीन बाटे,

    बजरत असमान।

    एकरा से लड़त-भीड़त,

    जिनगी हलकान॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 94)
    • रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
    • प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
    • संस्करण : 2015

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY