Font by Mehr Nastaliq Web

सजी सुखवा लूटे रजधानी

saji sukhva lute rajdhani

ब्रजभूषण मिश्र

ब्रजभूषण मिश्र

सजी सुखवा लूटे रजधानी

ब्रजभूषण मिश्र

और अधिकब्रजभूषण मिश्र

    सजी सुखवा लूटे रजधानी,

    कि बड़का लोग काटत बाटे चानी।

    कहे के सुराज मिलल,

    जनता का राज मिलल;

    बाकी ना गरीबवन का

    भरपेट अनाज मिलल।

    जुड़त नइखे पीयेवाला पानी।

    रहे के घर नइखे,

    देह प' बहतर नइखे;

    जिअलो दुलम भइले

    होखतो गुजर नइखे।

    असहीं जिनिगिया झुरानी।

    कतना वादा भइल

    बहुते इरादा भइल;

    जन सेवा नाम पर

    फरजी से पियादा भइल।

    सभे वादा गइले भुलानी।

    जतना हजूर बाड़ें,

    गरबे में चूर बाड़ें;

    पाँच तारा होटल के

    भोज भरपूर मारें।

    पीयत बाड़ें बोतल वाला पानी,

    कि बड़का लोग काटत बाटे चानी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 107)
    • रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
    • प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
    • संस्करण : 2015

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY