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सब अपने बेगरते बेकल भेल रे

sab apne begarte bekal bhel re

अमित पाठक

अमित पाठक

सब अपने बेगरते बेकल भेल रे

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    माटि मिथिलाक कानब सुनै ने कियो

    सब अपने बेगरते बेकल भेल रे

    ऐंठि दोसरकेँ छोड़ल जे परदेसमे

    चाटि गौरव बुझए एकर टेल्ह रे

    माटि मिथिलाक कानब...

    छोड़ि अपन जथा, जी हुजूरी करए

    जाक' ढाका-बंगल्ला मजूरी करए

    डीह पर एक बाती जरौ ने जरौ

    जड़ि जहाँकेँ जुड़ाबए एकर स्वेद रे

    माटि मिथिलाक कानब...

    हर जोतब ने इज्जतिकेँ मंजूर छै

    बरू ठेला घिचैक लेल मजबूर छै

    चोट सबतरिकेँ क्षणमे बिसरिक' देखू

    रोज गाड़ी धरैए जेरक-जेर रे

    माटि मिथिलाक कानब...

    स्वार्थक पाँजसँ लोक छूटत कखन

    मातृ ममता महिमाकेँ बूझत कखन

    यैह बेर-बेर पूछए हमर आत्मा

    माय हेतैक सम्बल कखन फेर रे

    माटि मिथिलाक कानब...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : राग-उपराग (पृष्ठ 55)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2017

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