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रुक्मिण तुमको जिज्ञासा थी

rukmin tumko jigyasa thi

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

रुक्मिण तुमको जिज्ञासा थी

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    रुक्मिण तुमको जिज्ञासा थी

    राधा रानी के दर्शन की

    देखो अब जी भर कर देखो

    ज्योति-जई मेरे जीवन की

    करती रही सदा मन ही मन

    मुग्ध-विभोर प्रीत की पूजा

    उसके श्याममयी दर्पण में

    झाँका नहीं रुप फिर दूजा

    होता था आभास सदा ही

    मेरा ही प्रतिविंब राधिका

    सुख का पारावार नहीं था

    सीमा नहीं स्नेह-सिंचन की

    मंद-मंद मुस्कान कि जैसे

    कमल पाँखुरी ओस भिगोई

    मुक्त हँसी का झरना जैसे

    हर सिंगार झरा हो कोई

    आँखो में लहराता सागर

    स्नेह-सुरभि-मय उच्च नासिका

    फूले दिन सा आकर्षक तन

    रजनी-गंधा निज आँगन की

    कानों के कुंडल गालों को

    चूम-चूम झूला करते थे

    वाणी के माधुर्य श्रवण को

    राह पथिक भूला करते थे

    चाह जागे दरस परस की

    तो संयम की क्या सराहना

    पूर्ण समर्पण हेतु विकल थी

    उपमा नहीं हृदय मंथन की

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 65)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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