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लोग मुसकइबे करी

log musakaibe kari

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

और अधिकरामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

    घरवा फूटी तऽ लोग मुसुकइबे करी।

    दाँव दुसमन आवन अजमइबे करी॥

    सुख देखि लोगवा के फाटेला छाती।

    मतलबी लोग कबो होला ना साथी॥

    तोहार देखिके विकास जरि जइबे करी,

    घरवा फूटी तऽ...

    भाई सगा के लोगवा भड़कावेला।

    उलटा समुझाके झगड़ा करावेला॥

    सुनबऽ बतिया तऽ लोग भड़कइबे करी।

    घरवा फूटी तऽ...

    मेहरी गुमान करे भतार की कमाई।

    हरदम निगाह रखे एक-एक पाई॥

    कान भरी त फूटमति समइबे करीं।

    घरवा फूटी तऽ...

    सगरी कमाई तोहार इहें रहि जाई।

    साथ लेके केहूना एको पाई जाई॥

    इहवें नेकी बदी रहि जइबे करी॥

    घरवा फूटी तऽ लोग मुसुकइबे करी॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गँउवा के माटी अनमोल (पृष्ठ 84)
    • रचनाकार : रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
    • प्रकाशन : अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, गोमतीनगर, लखनऊ
    • संस्करण : 2010

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