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राशियाँ सभी मेरी, सब नक्षत्र मेरे हैं

rashiyan sabhi meri, sab nakshatr mere hain

क्षितिज

क्षितिज

राशियाँ सभी मेरी, सब नक्षत्र मेरे हैं

क्षितिज

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    सूर्य बनके चमका मैं धूप की कहानी में

    चाँदनी पिरोता हूँ चाँद की जवानी में

    मैं जहाँ उपस्थित हूँ बस वहीं पे मंगल है

    बुद्ध मेरे चरखे को कातने का प्रतिफल है

    मैं ही तो बृहस्पति के मुख की गुरुवाणी हूँ

    मैं ही शुक्र में धन की वो चुनरिया धानी हूँ

    मैं ही शनि बना बैठा काल की कपाली पे

    मैं ही राहू-केतू हूँ इस समय की डाली पे

    मुझसे निकले ग्रह सारे और मुझे ही घेरे हैं

    राशियाँ सभी मेरी, सब नक्षत्र मेरे हैं

    मैं ही कुण्डली लिखता भाग्य का विधाता हूँ

    मैं घड़ी की टिक-टिक में मौन राग गाता हूँ

    मैं धरा पे छलका हूँ आसमाँ की आखों से

    दिन से मेरा याराना दोस्ती है रातों से

    मैंने अपने ही अंदर खेल सब रचाया है

    मुझको सिवा मेरे ही कौन ढूँढ पाया है

    सिर्फ़ एक मैं ही हूँ जो सभी में शामिल है

    जो है राही, रस्ता वो और वो ही मंज़िल है

    रौशनी है मुझसे ही मेरे ही अँधेरे हैं

    राशियाँ सभी मेरी, सब नक्षत्र मेरे हैं

    स्रोत :
    • रचनाकार : क्षितिज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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