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राधे यह कैसी विडंबना

radhe ye kaisi viDambna

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

राधे यह कैसी विडंबना

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    राधे यह कैसी विडंबना

    शक्त्ति महान अशक्त रहीं तुम

    स्वाभिमान का पर्वत साधे

    क्वाँरी ही परित्यक्त रहीं तुम

    पूनम की दूधिया चाँदनी

    नील गगन जैसी विशाल थीं

    वर्षा-ऋतु-मन इंद्रधनुष-तन

    फागुन का उड़ता गुलाल वही

    स्नेह-मयी पूजा-श्रद्धा का

    मंदिर थीं पर भक्त रहीं तुम

    यौवन का आगमन स्वयं में

    मीत बिना है एक समस्या

    मेरी मर्यादा के कारण

    करती रहीं कठोर तपस्या

    रोम-रोम में प्रीत बसाए

    एकाकी अनुरक्त रहीं तुम

    लाँधी नहीं कभी भी तुमने

    स्वयं ख़ींच ली थीं रेखाएँ

    लिपटी नहीं कभी वृक्षों से

    सिमटी रहीं अलग लतिकाएँ

    आहुति बनीं यज्ञशाला की

    वरदानी अव्यक्त रहीं तुम

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 53)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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