राम मंत्रवत अहँक नाम जपि-जपि दिवस बितावै छी
raam mantrvat ahank naam japi japi divas bitavai chhi
कालीकान्त झा ‘बूच’
Kalikant Jha 'Booch'
राम मंत्रवत अहँक नाम जपि-जपि दिवस बितावै छी
raam mantrvat ahank naam japi japi divas bitavai chhi
Kalikant Jha 'Booch'
कालीकान्त झा ‘बूच’
और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’
राम मंत्रवत अहँक नाम जपि-जपि दिवस बितावै छी,
रातुक बीच चान पर तपि-तपि ध्यान लगावै छी।
कहू अहाँ की आन हमर छी,
देहक रूसल प्राण हमर छी
हे पाथरक देवता जागू
अहीं एक भगवान हमर छी
हम निर्दोष फूल तैयो निरमाल बनावै छी,
रातुक...
जाहि बाट केँ नित्य बहारी
हम तीतल आँचर सँ झारी,
जकरा अपना मे रखने अछि,
हमर आँखि ई कारी-कारी
आइ ताहि पर किएक अलसित गति सँ आवै छी
रातुक...
हमरा लेल राजपद त्यागू
भवन छोड़ि कानन केँ भागू,
पाछूक सीता सन सुन्नरि
दौडि पड़ि औ आगू-आगू,
प्यासल प्रेमक जलद मर्यादा किएक जगावै छी
रातुक...
आऊ-आऊ हे प्रिय अभ्यागत
अछि पसरल हृदयासन स्वागत
प्रियतम अहँक पलकहुँ लकि सँ,
हमर जन्म जन्मान्तर जागत
लाऊ पखारि चरण नयन सँ जल छलकाबै छी,
रातुक....
- पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 22)
- रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
- प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
- संस्करण : 2010
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