Font by Mehr Nastaliq Web

पुरिखवा कइसे सरगै जायँ

purikhva kaise saragai jayan

अशोक अज्ञानी

अशोक अज्ञानी

पुरिखवा कइसे सरगै जायँ

अशोक अज्ञानी

और अधिकअशोक अज्ञानी

    मरे मा पीतर पानी पावैं

    जिन्दा मा बिललायँ।

    पुरिखवा कइसे सरगै जायँ।

    पौरुख जब ते घटिगा मानौ

    घटिगै है कद काठी।

    हालु बुढ़ापा का वइसन जस

    कोने पर कै लाठी।

    नौजवान सोफा के ऊपर

    परे परे अँगड़ाय।

    पुरिखवा कइसे सरगै जायँ।

    दूधे की माछी जस होइगे हैं

    अब घर के बूढ़े।

    सब कुछु घर मा भरा परा मुलु

    आदरु मिलै ढूँढ़े।

    माई बाप का बासी खाना

    कूकुर ताजा खायँ।

    पुरिखवा कइसे सरगै जायँ।

    तीरथ कै जब बात चलै तो

    सरवन के गुन गावैं।

    बूढ़े माई औरु बाप का

    कबौ नाहि नहवावें।

    जब जब आवै पूरनमासी

    गंगा खुदै नहायँ।

    पुरिखवा कइसे सरगै जायँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक अज्ञानी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित।

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY