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ग्लोबल मिथिला

global mithila

विभूति आनंद

विभूति आनंद

ग्लोबल मिथिला

विभूति आनंद

और अधिकविभूति आनंद

    गाछक दोग सँ सुरुज उगै छै,

    मस्जिद सँ ऊठै अजान

    चौकीपर बाबा प्राती गबै छथि,

    जागै चेहायले बिहान

    बटोही, देखब जरूर हमर गाम!

    पछबा दुलारै छै गामक सिमानकें,

    सूतल उठाबै ओछान

    भकुआयल चेहरापर बूलैए सपना,

    हर्षित ई बाबा दलान

    छूबै छै जखने टटका बसात हाथ,

    नाचै मयूर-मन प्राण

    बटोही, देखब जरूर हमर गाम!

    पोखरि सँ नीक लगै धावित नदी ई,

    कलकल करै जत पानि

    इजोतक भरोस लऽ फहरै जे जनमन,

    रस्ता नै कोनो उबानि

    दूर बहुत दूर नाह बैसल अबै जनु

    दपदप मुँह पूनिम के चान

    बटोही, देखब जरूर हमर गाम!

    नव-नव कोपड़ फूटि रहल सगरो

    आबि रहल नव-नव विचार

    घर-घर विद्या हुलसि मन जीबय

    बदलय निरर्थक आचार

    ग्लोबल बनल जन, पोसल मनोरथ,

    नवताकें कऽ कऽ चुमान

    बटोही, देखब जरूर हमर गाम!

    पुरना जे चेहरा रोपने छी मोन अहाँ,

    भेटत न नाम ओ निशान

    बाबा विद्यापति-ललित पद संगे,

    यात्री-पद जीवन-प्रमाण

    खलखल हँसै छै मिथि-भूमि मिथिला से

    ग्लोबक विविध स्थान

    बटोही, देखब जरूर हमर गाम!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पीयर रौद पियरगर धरती (गीत-संग्रह) (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : विभूति आनन्द
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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