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पायब नहि तुअ पार

payab nahi tua paar

अमित पाठक

अमित पाठक

पायब नहि तुअ पार

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    हे गंगा मैया

    पायब नहि तुअ पार

    महिमा अगम अपार

    हे गंगा मैया

    पायब नहि तुअ पार...

    खन् शिव जटा विराजल, खनहि

    बासित बीच पहाड़

    उतरि हिमालयसँ धरणी धरि

    कएल अपन विस्तार

    हे गंगा मैया

    पायब नहि तुअ पार...

    युगहु-युगहुसँ निर्मल शीतल

    अविरल तुअ जलधार

    पाप हरए पापीक सदासँ

    करए पतित उद्धार

    हे गंगा मैया

    पायब नहि तुअ पार...

    क्षेमहु सकल अपराध हे गंगे

    शरण गहल भए ठाढ़

    मतिहीनहि बरू, एक अबोधक

    करहु विनय स्वीकार

    हे गंगा मैया

    पायब नहि तुअ पार...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : राग-उपराग (पृष्ठ 53)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2017

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