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पीड़ा से गीत बुने हमने

piDa se geet bune hamne

स्वरिका कीर्ति

स्वरिका कीर्ति

पीड़ा से गीत बुने हमने

स्वरिका कीर्ति

और अधिकस्वरिका कीर्ति

    मुस्कानों के मधु गान नहीं,

    अंतर के अश्रु चुने हमने,

    पीड़ा से गीत बुने हमने!

    यदि गाते केवल यशोगान, या शौर्य किसी सम्रांगण के,

    अपराधी होते गीत मेरे, विधवाओं के, शिशु क्रंदन के!

    यदि गीत अटारी कंगूरे, महलों की बस शोभा गाते

    नींवों की पीड़ा के सम्मुख, लज्जित होकर ये झुक जाते,

    अनकही व्यथाओं को गाया,

    अवहेलित मौन सुने हमने

    जब प्रेम लिखा है गीतों में, हमने कभी अभिसार लिखा,

    तप लिखा, लिखा संकल्प सदृश, भावों का शुभ उपहार लिखा

    जब तक जलती है दीपशिखा, हैं गीत दीप के हिस्सों में,

    वर्तिका स्वयं जल शून्य हुई, हो गई उपेक्षित क़िस्सों में?

    वो हुई यज्ञ की समिधा-सी,

    उसके वो भाव गुने हमने।

    गीतों में सावन गाऊँ बस, तो पतझड़ प्रश्न उठाते हैं

    बादल धरती को दे रिमझिम, कितने खाली हो जाते हैं

    उस खालीपन का मान लिखा, सूरज के ढलने को गाया,

    जो सब कुछ देकर रिक्त हुए, उनको गीतों में दोहराया,

    शून्यता सहेजी, दुख गाए,

    अनकहे अनसुने से हमने

    स्रोत :
    • रचनाकार : स्वरिका कीर्ति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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