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पहाड़ हमर बाटपर

pahaD hamar batpar

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

पहाड़ हमर बाटपर

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    आँखिमे पिशाच अछि,

    चुड़ैल अछि ललाटपर;

    फेर टूटि खसल अछि पहाड़ हमर बाटपर!

    कोनो कंसक जहलमे—

    भविष्यक कन्हैया अछि;

    नट्ठा भऽ गेल कामधेनु,

    बाँझ गैया अछि

    बटमारीमे अछि—

    घटबारे, सभ घाटपर!

    ढाकी भरि गारि उछालै छी,

    डहकनो गबै छी;

    तैयो नहि शान्तिक सिदहा,

    आँगनमे आनि पबै छी

    बज्र खसौ मुँहजरुआ—

    राजापर, लाटपर!

    असुरक्षाकेर साँप सहसहा

    फन काढ़ैए

    भूखक सिंहिनीकेँ जगा

    वीरासनमें ठाढ़ैए

    एहनामे सूति रहत

    के अपन खाटपर?

    फेर टूटि खसल अछि पहाड़ हमर बाटपर!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 75)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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