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हंसलहुँ एक बेर जीवन में, बेरि-बेरि कनैत रहल छी।

बसलहुँ एक बेर जीवन मे, फेर-फेर उजड़ैत रहल छी।

चलि-चलि भटकि-भटकि कऽ कखनो,

कखनो कऽ हम दौड़ि रहल छी।

एक बुन्न जीवन लेल

मरि-मरि कऽ मरू मे बौड़ि रहल छी।

अपन मोन केँ उघबा कऽ आनक तन केँ उछहैत रहल छी।

बसलहुँ...

एक-एक सायक चोट केँ,

गुनि-गुनि छोट ध्यान नहिं देलहुँ।

बड़ कचोट चालनिक रूप मे,

देखि-देखि चुप्पे रहि गेलहुँ।

ठोप-ठोप चारक चुआठ केँ आँगुर सँ उपछैत रहल छी।

बसलहुँ...

शिल्पक छाँछ कल्पना पूरा,

भावक दही विचारक चूड़ा।

आनलक जे बेगाड़ भूख मे,

पाबि रहल अछि खुद्दी गूड़ा।

नवनीतक अछि लूट मुँदा हम छाँछी छोरक लैत रहल छी।

बसलहुँ...

स्रोत :
  • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 52)
  • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
  • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2010

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