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ना जाने कजरा के मोल

na jane kajra ke mol

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

ना जाने कजरा के मोल

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    ना जाने कजरा के मोल,

    बलम हमरो परदेसिया। ना जाने…

    हथवा में झनकेले हरी-हरी चुरिया

    मुंदरी अँगुरिया में गोल,

    कँगना खनकि उठे मनवाँ के अँगना

    सूने ना पयलिया के बोल,

    बलम हमरो परदेसिया। ना जाने…

    रहि-रहि के मंगिया बिहँसे सेनुरवा

    अंगिया बहकि उठे मोर,

    उड़ि-उड़ि अँचरवा कहे रे सुनु सखिया

    बिंदिया गुने ना अनमोल,

    बलम हमरो परदेसिया। ना जाने…

    झुलनी झमकि उठे नथिया के कगरी

    झाँके झुमकिया की ओर,

    पइयाँ के बिछुवा रे सँइया के पूछे

    बूझे नाहीं रे अँटिलोल,

    बलम हमरो परदेसिया। ना जाने…

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 107)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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