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मुन्ना कक्का सासुर चलला

munna kakka sasur challa

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

मुन्ना कक्का सासुर चलला

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    कच्छी कऽसि-कऽसि तहिपर धोती रऽचि रऽचि कऽ।

    मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

    सबसँ पहिने पोखरि धँसला,

    चढिते काठ उनटि कऽ खसला।

    मललनि माथ माँटि करिऔटी,

    ऊपर अयला झारि लंगोटी।

    अधमोनी झामा सँ गत्तर-गत्तर मलि-मलि कऽ,

    मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

    एते किएक बेकल हौ मुँन्ना,

    तोरे एकटा सासुर की?

    जतरा करऽ दिन देखबा कऽ,

    बाबा जी कहि देलनि ई।

    अधपहरा जखने हेतै, दू मिनट हेतै दस बजि कऽ,

    मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

    ताबरतोर चलल जा रहला,

    जेठक तेज विहाडि जकाँ।

    रैन कतहु ने, पडे बाट मे,

    साँझ लगए मुँनहारि जकाँ।

    हुलसल डेग बढाबथि आगाँ हुमचि-हुमचि कऽ,

    मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

    झाँपल मुँहें सासु कहलथिन,

    झा हमरा बड मानै छथि।

    जखन-तखन हमरो खातिर,

    गरमे रसगुल्ला आनै छथि।

    अझुका सबटा गुलगुल्ला थिक झा बजला हँसि-हँसि कऽ,

    मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 133)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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