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मन काहे विकल भइल

man kahe vikal bhail

रमाकान्त मुकुल

रमाकान्त मुकुल

मन काहे विकल भइल

रमाकान्त मुकुल

और अधिकरमाकान्त मुकुल

    जब से टूट गइल सुख के सुन्दर सपना

    सोच-सोच के तब काहे मन विकल भइल

    आसमान में धीरे से उग के चन्दा

    जड़ चेतन के हँस-हँस भरमावेला

    विहँसेला जब फूल वसन्ती बेला में

    झूम-झूम मस्ती में उपवन गावेला

    जइसे पतझर चुपके से बगिया में

    सूना कर जाला हर बाग-बगइचा के

    तसही करवट बदलेला जब समय कबो

    चल के चाँद सुबह तक जान गँवावेला

    रूठ गइल जब फूलन से मधुमास मधुर

    तब काहे मन सोच-सोच के विकल भइल

    गूँज रहल संगीत जवन मीठा-मीठा

    बन के प्रीत उहे उतरेला जीवन में

    सुन के कान्हा के वंशी के तान मधुर

    राधा जइसे दउड़त पहुँचे मधुवन में

    बाकिर समझे के बा समय कहाँ केकरा

    जे सुध-बुध सब गँवा प्रेम में लुट जाई

    उतरल ना अब तक जइसे जमुना जल से

    घोरा गइल जे श्याम रंग बा तन-मन में

    जब सूखल गछिया कदम्ब के ना पनकल

    तब काहे मन सोच-सोच के विकल भइल

    जब उलझन के बा मन में ताना-बाना

    लागल तब ले रही इहाँ आना-जाना

    जब संघर्ष सारथी बन के समय-रथी

    बन जाला तब हार, जीत के पैमाना

    द्वैत अरु अद्वैत के खींचा-तानी में

    केहू भेद सकल ना दुख के चक्रव्यूह

    छोड़ रहल बा तीर जयद्रथ संहारी

    करे धनुष टंकार पार्थ के मनमाना

    बाकिर जब अर्जुन के चिता सजल साँझे

    तब काहे मन सोच-सोच के विकल भइल

    स्रोत :
    • पुस्तक : आँचर के टुकड़ा (पृष्ठ 33)
    • रचनाकार : रमाकान्त मुकुल
    • प्रकाशन : भोजपुरी संस्थान, पटना
    • संस्करण : 2003

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