Font by Mehr Nastaliq Web

माँथ पर धान

maanth par dhaan

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

माँथ पर धान

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    की लचकल अछरल पछरल डाँड़,

    की मचकल आँचर गछरल फाँड़,

    चालि उत्तान छै,

    माँथ पर धान छै।

    बढ़े छै रूनरून रूनरून शीस,

    पडै छै दीठि पायलक दीस,

    कंठ मे गान छै।

    माँथ पर धान छै।

    की चमकल बुट्टी-बुट्टी देह,

    ठोर पर हासक पातर रेह,

    गाल तर पान छै।

    माँथ पर धान छै।

    आँखि पर लागल लाजक बोझ,

    घोघ सँ ताकय सोझे सोझ,

    लक्ष्य खरिहान छै।

    माँथ पर धान छै।

    भक्त रहलै मंदिर केँ झोलि,

    गेलै दू-दू शिव आसन डोलि,

    अभय वरदान छै

    माँथ पर धान छै।

    वियोगक वीतल कारी रैन,

    जुड़ायल आइ मुँड़ायल नैन,

    गगन मे चान छै,

    माँथ पर धान छै।

    काटि कऽ माल भोग केर खेत,

    बान्हि कऽ बोझ चललि समवेत,

    गमागम प्राण छै।

    माँथ पर धान छै।

    वदन पर अनुचित अलुपित दृष्टि,

    चरण पर करू सिनेहक दृष्टि

    एतय भगवान छै।

    माँथ पर धान छै।

    हे चरऽरक चंडी धऽरक देवि,

    देश बढ़ि रहल अहाँ के सेवि,

    मोँछ पर शान छै।

    माँथ पर धान छै।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 92)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    हिन्दवी उत्सव 2026

    रजिस्टर कीजिए