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लगी जाई भूख त का खइबा हो

lagi jai bhookh ta ka khaiba ho

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

लगी जाई भूख त का खइबा हो

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    लगी जाई भूख का खइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया।

    जेने तेने पेटवा जरइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    रात अन्हियरिया में उगत अँजोरिया।

    रउवा के विचार बदे हमनी छोरिया।

    बने बने कहाँ ठुकरइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    घुमरल नदिया बा नार बन झारी।

    काँट कूस रहिया में पथरा पहारी।

    बनवा विकट भरमइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    सवना भदउँवा में बरसा दिनवा।

    जेठुई लुवार आई मघवा महीनवा।

    दिन रात कइसे बितइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    केकरे अंचरवा के छँहिया छँहइला।

    कवनी नगरिया के सून कर अइला।

    रउवा कहीं धोखवा उठइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    कवने नगरिया लोग निरदइया।

    घरवा में रहलीं की नाहीं संग मइया।

    कहाँ जाई ठहर बनइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    'बावला' गँवार कहैं मिलि जुलि आवा।

    छपरा मड़इया में हमरे बितावा।

    रहिया भटकले घेरइबा हो, मोरे बबुआ बटोहिया॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत मंजरी
    • संपादक : हरिराम द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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