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कितनी टूटी-फूटी किरचें

kitni tuti phuti kirchen

विभूति तिवारी

विभूति तिवारी

कितनी टूटी-फूटी किरचें

विभूति तिवारी

और अधिकविभूति तिवारी

    कितनी टूटी-फूटी किरचें 

    मन में ढोते हैं। 

    पीस स्वार्थ की चक्की में निज 

    टिक्का पोते हैं॥ 

    हम समेट ताबीरें स्वप्निल

    कब से बैठे हैं।

    महल गिराकर देव नियति के

    अब भी ऐंठे हैं॥

    हम कोल्हू के बैल जगत के

    हाथों जोते हैं।

    कितनी टूटी-फूटी...॥

    पंजीरी का भोग देव की

    चौखट धरते हम।

    धन्य हमारी लेखी जब-तब

    कच्चा चरते हम॥

    तीन बूँद चरणामृत के बस

    हमको होते हैं।

    कितनी टूटी-फूटी...॥

    एकसमान गढ़ी दुनिया हित

    सबके ख़ातिर है।

    तंत्र अलग अपने हित सारा 

    बैठा शातिर है॥

    हास और परिहास ऊपरी 

    अंतस् रोते हैं।

    कितनी टूटी-फूटी...॥

    हम दुनिया के हाट अकेले

    छोड़ गए अपने।

    धुन में जगत बदलने की सब

    टूट गए सपने॥

    यादों की सरिता उतराते

    ठहरे ग़ोते हैं।

    कितनी टूटी-फूटी...॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : विभूति तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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