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खिल उठे मनवा उदास

khil uthe manva udaas

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

खिल उठे मनवा उदास

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

और अधिकरामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

    चढ़ते असढ़वा बरसे बदरवा,

    कि धरती के बूझेला पियासि।

    बड़ा नीक लागे हरियर दुबिया,

    खिलि उठे मनवा उदास॥...

    लेके कुदरिया चले खेतवा किसनवां,

    हरवा बैलवा के साथ।

    लोटवा में पनिया लेके चले गोरिया,

    खुरुपी खँचोली लेइ माथ॥

    गंजवाँ के माटी अनमोल

    बिनि-बिनि दुबिया किसान कोड़े खेतवा,

    गोरिया निरावे बीनि घास॥ खिलि...

    खेतवा में धनवा के बेड़ लहराला,

    ककड़ी के मन हुलसात।

    टर-टर मेघा मधुर गीति गावे,

    ताल तलइया भरि जात॥

    पँखिया पसारि के नाचेले मोरनिया

    अपनी सजनवा के पास॥ खिलि...

    अमवा के गँछिया पर झुलत दिखे गोरी,

    सखिया सहेलिया के साथ।

    कजरी के गितिया बहुत मन भावन,

    मेहदी रचावे गोरे हाथ॥

    बिनु रे सजनवां के तरसेला मनवां,

    सुखले बीतेला सावन मास॥ खिलि...

    स्रोत :
    • पुस्तक : गँउवा के माटी अनमोल (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
    • प्रकाशन : अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, गोमतीनगर, लखनऊ
    • संस्करण : 2010

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