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कवि से

kavi se

मूंगालाल शास्त्री

और अधिकमूंगालाल शास्त्री

    (एक)

    खुलल आकाश गोदी धरती के गुलगुल,

    बहत बेयार धर कवि भोजपुरिया।

    धह-धह अगिनी अथाह जल सागर के,

    मुठिए में बन्द कर कवि भोजपुरिया।

    साधना से सिरिज तू पोसल पोल्हाल कहीं

    सधने से नाश के चलाव तेरुअरिया।

    बाकिर शब्द के भिखारी भीख मत जा तू—

    देवे कवि अब भोजपुरी नाहीं लोलनीपुतरिया।

    (दू)

    उपमा उपमेय अरथ गौरव के गीत गाव,

    पद के ललित लिख कवि भोजपुरिया।

    गुण रस रीति अलंकार से सजाव रूप,

    अपरूप निहार भाषा कवि भोजपुरिया।

    वाणी के सपूत नित वाणी के जगाव फूल,

    लोढ़ि-लोढ़ि पूजके लगाव आपन कूँड़िया।

    दोसरा का कूँड़िया के फूल मत चोरा के पूजऽ,

    एकरा से बढ़िके दोसर बाना हतेअरिया॥

    (तीन)

    चुटुकी भर रंग इन्द्रधनुषी जे चित हरे,

    हव शब्द शिल्पी तू कवि भोजपुरिया

    मरलो में सांस फूँक सुखलोमें रस भर

    ललकार लेखनी से कवि भोजपुरिया

    अर्थ के कमान बाण हिरिदिया में मार तान,

    खोल दिमाग के तु बजरो केंवरिया

    हाव-भाव आँख-मुँह से कके मत हँसाव कवि,

    लाग जइसे नाच के तू हव मसखरिया।

    (चार)

    कल्पना से कोर उटकेर भाव एने ओने,

    डाल बिआ कविता के कवि भोजपुरिया।

    मोती अनमोल मूंगा दूरे कोई काहे खोजी,

    गागर में सागर भर कवि भोजपुरिया।

    दिल दिमाग राख साहित का आंगना में,

    अपना से खोल कवनो दोसरो दुअरिया।

    लीक पर लीक अब लगाव मत तू लीक कवि,

    चलले पर चलके खिआव झूठो एरिया॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : भिनुसार हो गइल (पृष्ठ 43)
    • रचनाकार : मूंगालाल शास्त्री
    • प्रकाशन : भोजपुरी भारती, सारण
    • संस्करण : 2016

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