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काहे होखत बाड़ू अतना अधीर धनिया

kahe hokhat baDu atna adhir dhaniya

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

काहे होखत बाड़ू अतना अधीर धनिया

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    काहे होखत बाड़ू अतना अधीर धनिया,

    लड़िके बदलीं जा आपन तकदीर धनिया।

    सहर कसबा भा गाँव, सगरे जुलुमिन के पाँव

    केहू हरी नाहीं हमनी के पीर धनिया।

    सगरे होता लूट-मार, नइखे कतहीं सरकार

    ठाढ़ होखऽ पोंछ अँखिया के नीर धनिया।

    जेकरा दउलत बेसुमार ओकरे सहर सिंगार,

    दीन-दुखियन के सहर, गंगा तीर धनिया।

    घिरल घाटा घनघोर, नइखे लउकत अँजोर,

    अब करे के बा, कवनो तदबीर धनिया।

    छोड़ सपना के बात, धरऽ धरती लात,

    मिलि-जुलि तूरे के बा अपने जंजीर धनिया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 29)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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