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जे छी अहाँ सतत हमरे छी

je chhi ahan satat hamre chhi

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

जे छी अहाँ सतत हमरे छी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

    जे छी अहाँ, सतत हमरे छी, मन होइछ अनुमान,

    अहिंक गन्धसँ मँह-मँह करइछ हमर वेआकुल प्रान।

    विश्व-नदीमे एमहर-ओमहर भसिआयल नाव,

    जखने जतहि कात लागय, लागय अहिंक लगाव।

    मानक आसन पाबि होअय अछि हमर पीठपर हाथ,

    अपमानक गरदनियाँ लागय, अहिंक झुकाओल माथ।

    नीक-बेजाय क्षणक दीयठिपर अहिंक सिनेहक टेम,

    अहिंक देल संचित धन अछि, अछि खिपटा वा हेम।

    अहिंक स्वरेँ बाजी जे बाजी अटपट तोतर बोल,

    अहिंक सुनाओल सुनी, बुझी, अछि ओना हमर की मोल।

    अहिंक आसपर, अहिंक भासपर चालित अछि यान,

    विना अहाँक अहँक तन मन जीवन अछि निष्प्राण।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गजल ओ गीत
    • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
    • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
    • संस्करण : 1991

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