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जाई जरूरे अन्हरिया हो, जनि होखऽ उदास

jai jarure anhariya ho, jani hokhऽ udaas

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

जाई जरूरे अन्हरिया हो, जनि होखऽ उदास

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    जाई जरूरे अन्हरिया हो, जनि होखऽ उदास।

    देस अउर दुनिया में

    मचल बा हलचल

    टूटि गइल बान्ह, भइल

    एके बा जल-थल

    तेज बहुत बड़ुए लहरिया हो, जनि होखऽ उदास।

    पच्छिम से चलल

    बवंडर वा भारी

    ढहि रहल गढ़, मठ

    मंदिर—पुजारी

    उड़सत बा लागल बजरिया हो, जनि होखऽ उदास।

    पूँजी के दंइत बा

    पंजा गड़वले

    जादू के छड़ी बा

    सगरे घुमवले

    टेढ़ भइल सभकर नजरिया हो, जनि होखऽ उदास।

    कब तक ले सूरूज के

    बदरी छिपाई

    भइल भुंइडोल केहू

    कहंवा लुकाई

    गूँजि रहल नयकी कजरिया हो, जनि होखऽ उदास।

    जाई जरूरे अन्हरिया हो, जनि होखऽ उदास।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 30)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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