जबसे मन में किसी यक्ष की पीड़ा बैठी
jabse man mein kisi yaksh ki piDa baithi
निशांत माधव
Nishant Madhav
जबसे मन में किसी यक्ष की पीड़ा बैठी
jabse man mein kisi yaksh ki piDa baithi
Nishant Madhav
निशांत माधव
और अधिकनिशांत माधव
जबसे मन में किसी यक्ष की पीड़ा बैठी,
अपना ही घर रामगिरी पर्वत लगता है।
तरु,लतिकाओं और मनोहर पुष्पों वाला,
यह कानन भी मन को नहीं रिझा पाता है।
रात दिवस अद्भुत उजियारे में रहते हैं,
किंतु अँधेरा मन से कहीं नहीं जाता है।
कड़ा हाथ से ढ़ीला पड़कर सरक चुका है,
सब कुछ माया केवल दुःख शाश्वत लगता है।
हर मिलने वाले में वही मेघ दिखता,
जिससे उस पीड़ित ने विनय याचना की थी।
ऐसे उसको सारी कथा सुना देते हैं,
जैसे उसने प्रथम-प्रथम सांत्वना दी थी।
लेकिन फिर वह मेघ कहीं पर खो जाता है,
वही मेघ जो हमें पुष्करावर्त लगता है।
- रचनाकार : निशांत माधव
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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