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हील हाइ-हाइ

heel hai hai

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    खुडियौलक कसि-कसि कऽ नीपल करेज केँ,

    धुरियौलक धीपल मनक हाइ वेज केँ,

    कहऽ पड़ल आइ—

    नील-नील चप्पल केर हील हाइ-हाइ।

    बेकसूर केश अधगेड़ेँ सँ काटल छै,

    कोन घसबहबाक हाथेँ छपाटल छै,

    अथवा हय दाइ—

    ठढ़िया गेन्हारी केँ चरि गेलै गाइ।

    पर्स लटकौने कमरच्छा सँ आयलि छै,

    नवसिक्खू डानि जकाँ भूखलि पियासलि छै,

    बचबऽ हौ भाइ—

    हऽम एक दूइये आखड़ अढाइ।

    एखनो धरि भौजी केँ लजवन्ती जगिते छनि,

    बूढ़ि भेली भैया लग लाज कते लगिते छनि,

    सुनहक ढ़ोढ़ाई—

    देखिये कऽ खा लै छी, घिबही मिठाइ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 33)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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