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गिरती पड़ती राधा

girti paDti radha

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

गिरती पड़ती राधा

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    गिरती पड़ती राधा

    पहुँच गई नगरी में

    पथ की सहकर बाधा

    धूल भरी चदरी में

    हाँ! हाँ! ये कुरुक्षेत्र

    सुनकर आश्वस्त हुई

    उनका है शिविर कहाँ

    पूछा तो त्रस्त हुई

    केवल सौ पग आगे

    मेले में शिविर लगे

    सुनते ही फफक उठी

    औंध गिरी बजरी में

    अंतस में हूक उठी

    मेरे पग और चलो

    जीवन की ज्योति अभी

    थोड़ा-सा और जलो

    एक नगरवासी ने

    बाँह पकड़ कर साधा

    मइया क्यों निकल पड़ी

    तपती दोपहरी में

    काँधा ले पकड़ ज़रा

    थोड़ा साहस करले

    ऐसे मत रो मइया

    मन में धीरज धर ले

    राज-पुरूष से कोई

    कारण अटका होगा

    प्रहरी से बतलाना

    बैठ बहाँ छतरी में

    कंपित पग से राधा

    बाँह, पकड़ कर चल दी

    बालों में धूल भरी

    मुख पीला ज्यों हल्दी

    जैसे बिन पहियों का

    टूटा रथ घिसट रहा

    अथवा लुढ़की जाती

    देह बँधी गठरी में

    द्वार शिविर के जाकर

    धरती पर लोट गई

    अस्फुट-सी वाणी में

    बोल उठी शब्द कई

    बाल सखी कान्हा की

    बरसाने वाली हूँ

    मूर्छित हो गई तुरत

    कहकर वे ख़बरी में

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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